About Event | Registration | News | ALF - Season 3: Dec 17-19, 2016

व्यंग्य-माननीय देशभक्त हैं

माननीय देशभक्त हैं। जबरदस्त देशभक्त हैं, जबरदस्ती की हद तक देशभक्त हैं। इस हद तक देशभक्त हैं कि जागते हुए हद पार करते हैं और सोते हुए सपने में सरहद पार करते हैं। माननीय की मान्यता है कि देशभक्ति के मामले में जबरदस्ती जायज ही नहीं, जरुरी भी है।

वैचारिकी - सत्ता, शासन और समय

सत्ता, शासन और समय के विरुद्ध कुछ भी बोलना सम्भवतः इन दिनों किसी भी हद तक अपराध माना जा सकता है। साहित्यकार या बुद्धिजीवी समाज की सर्वाधिक तिरिस्कृत संज्ञा बन ही गई है। कवि सिर्फ उसे माना जा रहा है जो प्रशस्ति के सतही नारे गढ़ते हुए किसी न किसी राजनैतिक शिविर की चौकीदारी में सीधा खड़ा है।

वैचारिक-आजादी की वर्षगाँठ

 स्वतंत्रता की 70 वीं वर्षगांठ पर उत्सव के पलों के बीच कुछ अप्रिय सवाल ऐसे झाँक रहे है जैसे किसी मेले को अबोध बच्चे अपनी खिड़कियों से निहार रहे हो। उत्सवधर्मिता की दलीलों में लालकिला से आम जन की जुबान नहीं, सामन्ती अंहकार के स्वर सुनाई दे रहे हैं। अंतर बस इतना है कि इन राजाओं को हमने चुना है। यह नजारा इतना व्यापक है कि संसदीय संस्थानों ईसे लेकर प्राथमिक विधालय की चौपाल तक तिरंगा फहराने वाले हाथ किसी ना किसी पूँजी जनित राजा के ही हैं।आम हथेलियाँ या तो तालियां बजा रही हैं या फिर सावधान खड़े होकर राष्ट्रीय गान गा रही है।

वैचारिकी - NSG और देश की प्रतिष्ठा

न्यूक्लियर सप्लाई ग्रुप (NSG) में भारत के शामिल नहीं होने को देश की प्रतिष्ठा से जोड़कर देखने वाले अपनी बड़ी हाय- तौबा कर रहे हैं ।ऐसा लग रहा है कि भारत को संयुक्त राष्ट्र संघ की सदस्यता से ही निष्काषित कर दिया गया हो।

वैचारिकी - विचार या विवेक की अनुपस्थिति

विचार या विवेक की अनुपस्थिति आज के समय का सबसे भयावय सच है। राजनैतिक गलियारों से लेकर समाज की दहलीज तक स्वार्थ और सुविधाएं इस कदर हावी है कि वे अपने मूल स्वरूप को स्वयं ही नहीं पहचान पा रही।

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